एक अविस्मरणीय प्रवास
माइनस २० से कभी कभी -४० तक के तापमान और तेज वायुवेगी वातावरण में अलास्का स्टेट ( अमेरिका ) के फेअरबेंक्स हवाई अड्डे से ४० किलोमीटर के इर्द-गिर्द क्षेत्र का पाँच दिन और पाँच रात का प्रवास है । एक रात और एक दिन जाने आने में विमान विहार होजाता है ।
माइनस २० से कभी कभी -४० तक के तापमान और तेज वायुवेगी वातावरण में अलास्का स्टेट ( अमेरिका ) के फेअरबेंक्स हवाई अड्डे से ४० किलोमीटर के इर्द-गिर्द क्षेत्र का पाँच दिन और पाँच रात का प्रवास है । एक रात और एक दिन जाने आने में विमान विहार होजाता है । यहाँ चारों ओर जमीन से पेड़ों और पहाड़ों तक की दूरियों पर बर्फ ही बर्फ की जमावट है ।
मानव अपने घुटनों तक की ऊँचाई में खड़ा रह कर फोटो भी खिंचवा लेता है। लकड़ी आदि के बने दो-तीन मंजिले होटलों और छोटे छोटे भोजनालयों तथा जीवन की सब प्रकार की गतिविधि के लिये रहने की विविध कार्यालयों में मानव ने सानुकूल तापमान बनाये रखने की अच्छी व्यवस्था कर ली है ॥
उत्तरायण में यह प्रवास उत्तरदिशा का था । माघ मास का शुक्ल पक्ष था *[i]शुक्लकृष्णे गती ह्येते जया एकादशी से माघ कवि जयन्ती तक में (३० जनवरी से ०३ फर्वरी २०१५) द्वापर युगाब्द ३१५ में महाप्रयाणार्थ बड़ा ही उत्तम मुहूर्त निकला था ; मुझे उन पाँचों की पञ्चत्वगति जैसी गति पाने के लिये; जो कि द्वापरयुग के शूरवीर और अलग अलग विद्याओं में निपुण थे
उन पाँचों पाण्ड़वों की माता कुन्ती का पौत्रवधू को दिया गया आशीर्वाद * भाग्यवन्तं प्रसूयेथा: न शूरं न च पण्डितम् । शूराश्च कृतविद्याश्च वने सीदन्ति मामका: ॥ वार्धक्य के कष्ट से भरपूर जीवन में उन पाँचों के जैसी पञ्चत्वगति पाने की मेरी इच्छा और मेरी धर्मपत्नी इनाम्माजी की मुझे जिलाये रखने की इच्छा और अनेक चेष्टाओं से बातों ही बातों में कृष्ण पक्ष चालू हो गया था फाल्गुन का । आपसी संवाद में ईश्वर ने निरुत्तर कर मुझे जापान लौटा लाये ॥
पहली रात वेस्टमार्क होटल से १० बजे से उष:काल के ४ बजे तक के समय में बस के द्वारा दूर दूर[1] तक जा कर मात्र फोल्डिंग चेयर और बेंचों पर बैठ कर एकाएक निकल आते हुए औरोरा दर्शन के लिये खुले आसमान में खड़े रह कर आकाश से धरती तक फैलाये गये[2] सूर्य के प्रतप्त वातावरण से धरती के शीतल वातावरण की टकराव के कारण कभी कभी बन गये इस औरोरा के सद् भाग्य से ही दर्शन हुआ करते हैं । उस उत्तरीय हरीतिमामय प्रकाश से मानव मात्र के हृदय में एवरग्रीन बने रहने का आनन्द मिलता रहता है ।
एकादशी से पूर्णिमा तक के रात-दिन के जागरण से तीसरी रात [3]को चेना हाँट स्प्रिंग के रूम से बाहर माइनस ३५ डिग्री सेण्टीग्रेड के तापमान में निकलने की मेरी ताकत खत्म हो गई थी । वहाँ की बर्फीली धरती से ९०० मीटर ऊँचे चेना पहाड़ पर जाना था । विगत चार दिन और चार रात के सन्तत जागरण से खत्म ताकत ने भले रूम से बाहर नहीं निकलने दिया ; परन्तु शारीरिक दर्द के साथ साथ बाईं निचली दंष्ट्रा के तीन दिन से चलते दर्द ने रूम में भी नींद तो नहीं लेने दी । दर्द को दर्द रहने दो के आग्रही स्वभाव ने जेब में रक्खी हुई पेन किलर गोलियों को मुँह तक भी नही जाने दिया । मेरे शारीरिक थकान की सीमा पार होचुकी थी । एसिटाइल कोलाइन का प्रमाण नाड़ीतन्त्र के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर में इतना बढ गया था कि टसकना भी भारी लगता था, जरा
सा भी विपरीत भाव हो जाने पर, मेरे स्वभाव के विरुद्ध [4] क्रोध को बढ़ावा देरहा था ।
सूर्य की ज्वालामुखी से निकलती वायु के इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि पदार्थों का धरती के चुम्बकीय आकर्षण-मण्डल और धरती तथा सूर्य के मध्यवर्ती वातावरण में सोलर कोरोना से निकले वातातप से नेओन गेस के द्वारा नाइट्रोजन ७८% और आँक्सीजन २१% के सामान्य रूप मे मिश्रण से विभिन्न वर्ण उत्पन्न हो जाते है । इन्हें अवकाशीय मंडल तक पहुँचने में दो दिन लग जाते हैं । यहाँ एकत्र होने पर नाइट्रोजन और आँक्सीजन की अधिकता से हरित रंग दिखाई देता है । पृथ्वी से ४०० मील की दूरी पर इलेक्ट्रोन्स को शीतल वायुमण्डल मे आने पर एक वर्ष की रात्रियों में लाल वर्णमण्डल १०० बार और पीत वर्णमण्डल ४० से १०० बार अलास्का में नासा पोलर सेटेलाइट के माध्यम से देखा गया है । यह उत्तर और दक्षिण दौनो दिशाओं में समान रूप से देखा जाता है । फार अल्ट्रावायलेट इमेजर के द्वारा इलेक्ट्रोन्स की एकत्रित गतिविधि से क्रमिक रूप से बिखरती हुई इलेक्ट्रोन् बीम की एक हरितरेखा दिखाई देती है । नासा पोलर सेटेलाइट के द्वारा दक्षिणी ध्रुव की ओर आस्ट्रेलिया और न्यूजीलेण्ड के बीच एवं उत्तरी ध्रुव की ओर अलास्का में इसके विविध आकार दिखाई दिये हैं, जिनके चित्र हर साल खींचे जा रहे हैं विशेष अभ्यास के लिये ६२,००० मील की दूरी से आते हुए अति प्रबल वेगवान् इस इलेक्ट्रोनिक बीम को दौनों ध्रुवों पर एक साथ देखा जा रहा है । सन् १९६८ की मार्च २६ के युनिवर्सल टाइम १०:४८:०५ पर ठीक उसी क्षण में उत्तरी और दक्षिणी दौनों ध्रुवों पर लिये गये चित्र नेट पर उपलब्ध हैं ॥
प्रत्यूषस् समय में चेना के सर्वोच्च शिखर का प्रवास कर लौटी हुई धर्मपत्नी का टसकते हुए भी स्वागत किया ।
पाँचवें दिन का प्रभात था । निर्धारित समय पर आठ कुत्तों की जोड़ी से दौड़ाने वाली कार्ट में मजे लूटने के लिये जाना था । इनाम्मा जी उस -४० डिग्री सेंटीग्रेड़ के बर्फीले तथा शरीर को ठिठुरादेने वाले तापमान में और तीव्र गति की दौड़ान में सामने से आने वाली बर्फीली प्रचण्ड हवा की मार से हो सकने वाले दुष्प्रभाव से बचने के लिये चलने का मना कर रही थी । पर मेरा आग्रह इतनी तकलीफ सहन करते रहने पर भी प्रबल रहा । हम सब सोलह लोगों के वर्ग में साथ साथ जुड़ गये । इस कुत्ता कार्ट की एक साथ चार लोगों की बैठक में मुझे सब से आगे वाली इनाम्माजी के प्रसारित पावों के बीच की बैठक मिली । हम सभी अध लेटे से, एक दूजे में घुसड़े से बैठे थे ।एक साथ जोते हुए आठ कुत्तों की पूरी तरह चारों ओर से खुली कार्ट के दौड़ान में श्वास लेने के लिये मफलर से ढके मास्क को हटाया कि बस नाक के दौनों पुट सूख गये । मार्ग मे मिले स्वागत निशान के नीचे बर्फकणिकाओं में बैठ कर फोटो भी खिंचवा ली । उसके बाद रूम में पहुँच कर नासापुटों में क्रीम लगाते रहा । फिर भी दाहिने नासा मार्ग के सेप्टम में क्षत हो गया ।
शरीर मर्दन (मसाज) और तेलमालिश का अनुभव कराने की चेना हाँट स्प्रिंग में व्यवस्था रहती है । मेरी धर्मपत्नी इनाम्माजी की चेष्टा रही । हमारे दुमंजिले मकान से काफी दूर वहाँ मसाज के स्थान पर गई । पूछ-ताछ करने पर मालुम हुआ कि इस दिन वहाँ की छुट्टी है । इनाम्माजी निराश थीं ::::छोटी इ से इनाम्मा जी की इच्छा में बड़ी ई की ईश्वर की इच्छा ने योगदान किया ॥ वहीं पर खड़ी टोकियो से आई हुई श्रीमती नीत्तो.आकेमी. ने सुन लीं थीं ये सब बातें :- "मेरा पति बुढ्ढा है, चल-फिर नहीं सकता , इसलिये व्हील चेयर पर है । पाँच रात-दिन की भरसक थकान और दंष्ट्रा-शूल से पीड़ित है, उसे शरीर पर मालिश मिल जाय तो कुछ रिकवरी हो जाय "आदि::आदि सत्ताईस साल के बेटे औेर २३ साल की बेटी की माँ आकेमी नीत्तो ने देवदूती की तरह इनाम्माजी का हाथ पकड़ लिया । रूम नम्बर ले लिया । यथासमय मेरे अंगमर्द को मिटा देने के लिये देवदूती आ पहुँची ।
इस शरीर पर अनेक तरह के मर्दन और तेलमालिश के अनुभव हुए हैं । भारत, यू.एस.ए., इण्डोनेशिया और जापान के विविध केन्द्रों के अलावा सिंगापुर, बेंकाक, फिन् लेंड, नोर्वे, स्वेडन, ऐस्टोनोया, ताइवान, चीन, लंदन, वियतनाम आदि अनेक देशों के अंगमर्द-प्रशमन नामक बाह्य उपचार का स्वयं के शरीर पर अनुभव कर लेने के बाद विद्यार्थियों को सिखाने के लिये हर जगह पर व्ययपूर्वक समय निकाला है ।
इस बार चेना हाँट स्प्रिंग (अलास्का) का अनुभव भले नहीं मिला परन्तु ईश्वर के द्वारा प्रेरित नीत्तो बहन ने जिस तरह अंगूठे एवं मुठ्ठी की मार से 90 मिनिट तक सारे शरीर को रगड़ रगड़ कर मेरे नाड़ीतन्त्र और मांसपेशयों में फँसे हुए एसिटाइल कोलाइन को निकाल कर मुझे तरोताज़ा कर दिया, मेरे नव-जीवन के लिये यह परमेश्वर-प्रसाद अविस्मरणीय रहेगा ॥
*****&&&&&&&&&*******
[1] :: शनिवार अमेरिका में ३१ जनवरी, जापान-भारत में ०१ फर्वरी २०१५ माउण्ट औरोरा स्काइलेण्ड, २३२०, फेयरबेंक्स क्रीक रोड़
[2] :: रविवार फर्वरी ०१, चान्दालर राँच ,५८०४ चेना हाँट स्प्रिंग रोड़ , पोष्टबाँक्स ७४८७७ फेयरबेन्क्स
[3]:: दो दिन-रात का चेना हाँट स्प्रिंग में निवास था । ओसाका से आने-जाने की दो रातें मिला कर कुल छै दिन और छै रात का प्रवास था ।
[4]::चरक संहिता इन्द्रिय स्थान स्वभाव विप्रतिपत्ति अध्याय के अनुसार
[i] :::Auroras are caused by charged particles, mainly electrons and protons, entering the atmosphere from above causing ionization and excitation of atmospheric constituents, and consequent optical emissions. Incident protons can also produce emissions as hydrogen atoms after gaining an electron from the atmosphere.
सूर्य की ज्वालामुखी से निकलती वायु के इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि पदार्थों का धरती के चुम्बकीय आकर्षण-मण्डल और धरती तथा सूर्य के मध्यवर्ती वातावरण में सोलर कोरोना से निकले वातातप से#######################
The immediate cause of the ionization and excitation of atmospheric constituents leading to auroral emissions was discovered in 1960, with a pioneering rocket flight made from Fort Churchill in Canada, to be a flux of electrons entering the atmosphere from above
oxygen emissions
green or orange-red, depending on the amount of energy absorbed.
Nitrogen emissions
blue or red; blue if the atom regains an electron after it has been ionized, red if returning to ground state from an excited state.
Interaction of the solar wind with Earth
The Earth is constantly immersed in the solar wind, a rarefied flow of hot plasma (a gas of free electrons and positive ions) emitted by the Sun in all directions, a result of the two-million-degree temperature of the Sun's outermost layer, the corona. The solar wind reaches Earth with a velocity typically around 400 km/s, a density of around 5 ions/cm3 and a magnetic field intensity of around 2–5 nT (nanoteslas; (for comparison, Earth's surface field is typically 30,000–50,000 nT).
यहाँ चारों ओर जमीन से पेड़ों और पहाड़ों तक की दूरियों पर बर्फ ही बर्फ की जमावट है ।
मानव अपने घुटनों तक की ऊँचाई में खड़ा रह कर फोटो भी खिंचवा लेता है। लकड़ी आदि के बने दो-तीन मंजिले होटलों और छोटे छोटे भोजनालयों तथा जीवन की सब प्रकार की गतिविधि के लिये रहने की विविध कार्यालयों में मानव ने सानुकूल तापमान बनाये रखने की अच्छी व्यवस्था कर ली है ॥
उत्तरायण में यह प्रवास उत्तरदिशा का था । माघ मास का शुक्ल पक्ष था *[i]शुक्लकृष्णे गती ह्येते जया एकादशी से माघ कवि जयन्ती तक में (३० जनवरी से ०३ फर्वरी २०१५) द्वापर युगाब्द ३१५ में महाप्रयाणार्थ बड़ा ही उत्तम मुहूर्त निकला था ; मुझे उन पाँचों की पञ्चत्वगति जैसी गति पाने के लिये; जो कि द्वापरयुग के शूरवीर और अलग अलग विद्याओं में निपुण थे ।
उन पाँचों पाण्ड़वों की माता कुन्ती का पौत्रवधू को दिया गया आशीर्वाद * भाग्यवन्तं प्रसूयेथा: न शूरं न च पण्डितम् । शूराश्च कृतविद्याश्च वने सीदन्ति मामका: ॥ वार्धक्य के कष्ट से भरपूर जीवन में उन पाँचों के जैसी पञ्चत्वगति पाने की मेरी इच्छा और मेरी धर्मपत्नी इनाम्माजी की मुझे जिलाये रखने की इच्छा और अनेक चेष्टाओं से बातों ही बातों में कृष्ण पक्ष चालू हो गया था फाल्गुन का । आपसी संवाद में ईश्वर ने निरुत्तर कर मुझे जापान लौटा लाये ॥
पहली रात वेस्टमार्क होटल से १० बजे से उष:काल के ४ बजे तक के समय में बस के द्वारा दूर दूर[1] तक जा कर मात्र फोल्डिंग चेयर और बेंचों पर बैठ कर एकाएक निकल आते हुए औरोरा दर्शन के लिये खुले आसमान में खड़े रह कर आकाश से धरती तक फैलाये गये[2] सूर्य के प्रतप्त वातावरण से धरती के शीतल वातावरण की टकराव के कारण कभी कभी बन गये इस औरोरा के सद् भाग्य से ही दर्शन हुआ करते हैं । उस उत्तरीय हरीतिमामय प्रकाश से मानव मात्र के हृदय में एवरग्रीन बने रहने का आनन्द मिलता रहता है ।
एकादशी से पूर्णिमा तक के रात-दिन के जागरण से तीसरी रात [3]को चेना हाँट स्प्रिंग के रूम से बाहर माइनस ३५ डिग्री सेण्टीग्रेड के तापमान में निकलने की मेरी ताकत खत्म हो गई थी । वहाँ की बर्फीली धरती से ९०० मीटर ऊँचे चेना पहाड़ पर जाना था । विगत चार दिन और चार रात के सन्तत जागरण से खत्म ताकत ने भले रूम से बाहर नहीं निकलने दिया ; परन्तु शारीरिक दर्द के साथ साथ बाईं निचली दंष्ट्रा के तीन दिन से चलते दर्द ने रूम में भी नींद तो नहीं लेने दी । दर्द को दर्द रहने दो के आग्रही स्वभाव ने जेब में रक्खी हुई पेन किलर गोलियों को मुँह तक भी नही जाने दिया । मेरे शारीरिक थकान की सीमा पार होचुकी थी । एसिटाइल कोलाइन का प्रमाण नाड़ीतन्त्र के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर में इतना बढ गया था कि टसकना भी भारी लगता था, जरा
सा भी विपरीत भाव हो जाने पर, मेरे स्वभाव के विरुद्ध [4] क्रोध को बढ़ावा देरहा था ।
सूर्य की ज्वालामुखी से निकलती वायु के इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि पदार्थों का धरती के चुम्बकीय आकर्षण-मण्डल और धरती तथा सूर्य के मध्यवर्ती वातावरण में सोलर कोरोना से निकले वातातप से नेओन गेस के द्वारा नाइट्रोजन ७८% और आँक्सीजन २१% के सामान्य रूप मे मिश्रण से विभिन्न वर्ण उत्पन्न हो जाते है । इन्हें अवकाशीय मंडल तक पहुँचने में दो दिन लग जाते हैं । यहाँ एकत्र होने पर नाइट्रोजन और आँक्सीजन की अधिकता से हरित रंग दिखाई देता है । पृथ्वी से ४०० मील की दूरी पर इलेक्ट्रोन्स को शीतल वायुमण्डल मे आने पर एक वर्ष की रात्रियों में लाल वर्णमण्डल १०० बार और पीत वर्णमण्डल ४० से १०० बार अलास्का में नासा पोलर सेटेलाइट के माध्यम से देखा गया है । यह उत्तर और दक्षिण दौनो दिशाओं में समान रूप से देखा जाता है । फार अल्ट्रावायलेट इमेजर के द्वारा इलेक्ट्रोन्स की एकत्रित गतिविधि से क्रमिक रूप से बिखरती हुई इलेक्ट्रोन् बीम की एक हरितरेखा दिखाई देती है । नासा पोलर सेटेलाइट के द्वारा दक्षिणी ध्रुव की ओर आस्ट्रेलिया और न्यूजीलेण्ड के बीच एवं उत्तरी ध्रुव की ओर अलास्का में इसके विविध आकार दिखाई दिये हैं, जिनके चित्र हर साल खींचे जा रहे हैं विशेष अभ्यास के लिये ६२,००० मील की दूरी से आते हुए अति प्रबल वेगवान् इस इलेक्ट्रोनिक बीम को दौनों ध्रुवों पर एक साथ देखा जा रहा है । सन् १९६८ की मार्च २६ के युनिवर्सल टाइम १०:४८:०५ पर ठीक उसी क्षण में उत्तरी और दक्षिणी दौनों ध्रुवों पर लिये गये चित्र नेट पर उपलब्ध हैं ॥
प्रत्यूषस् समय में चेना के सर्वोच्च शिखर का प्रवास कर लौटी हुई धर्मपत्नी का टसकते हुए भी स्वागत किया ।
पाँचवें दिन का प्रभात था । निर्धारित समय पर आठ कुत्तों की जोड़ी से दौड़ाने वाली कार्ट में मजे लूटने के लिये जाना था । इनाम्मा जी उस -४० डिग्री सेंटीग्रेड़ के बर्फीले तथा शरीर को ठिठुरादेने वाले तापमान में और तीव्र गति की दौड़ान में सामने से आने वाली बर्फीली प्रचण्ड हवा की मार से हो सकने वाले दुष्प्रभाव से बचने के लिये चलने का मना कर रही थी । पर मेरा आग्रह इतनी तकलीफ सहन करते रहने पर भी प्रबल रहा । हम सब सोलह लोगों के वर्ग में साथ साथ जुड़ गये । इस कुत्ता कार्ट की एक साथ चार लोगों की बैठक में मुझे सब से आगे वाली इनाम्माजी के प्रसारित पावों के बीच की बैठक मिली । हम सभी अध लेटे से, एक दूजे में घुसड़े से बैठे थे ।एक साथ जोते हुए आठ कुत्तों की पूरी तरह चारों ओर से खुली कार्ट के दौड़ान में श्वास लेने के लिये मफलर से ढके मास्क को हटाया कि बस नाक के दौनों पुट सूख गये । मार्ग मे मिले स्वागत निशान के नीचे बर्फकणिकाओं में बैठ कर फोटो भी खिंचवा ली । उसके बाद रूम में पहुँच कर नासापुटों में क्रीम लगाते रहा । फिर भी दाहिने नासा मार्ग के सेप्टम में क्षत हो गया ।
शरीर मर्दन (मसाज) और तेलमालिश का अनुभव कराने की चेना हाँट स्प्रिंग में व्यवस्था रहती है । मेरी धर्मपत्नी इनाम्माजी की चेष्टा रही । हमारे दुमंजिले मकान से काफी दूर वहाँ मसाज के स्थान पर गई । पूछ-ताछ करने पर मालुम हुआ कि इस दिन वहाँ की छुट्टी है । इनाम्माजी निराश थीं ::::छोटी इ से इनाम्मा जी की इच्छा में बड़ी ई की ईश्वर की इच्छा ने योगदान किया ॥ वहीं पर खड़ी टोकियो से आई हुई श्रीमती नीत्तो.आकेमी. ने सुन लीं थीं ये सब बातें :- "मेरा पति बुढ्ढा है, चल-फिर नहीं सकता , इसलिये व्हील चेयर पर है । पाँच रात-दिन की भरसक थकान और दंष्ट्रा-शूल से पीड़ित है, उसे शरीर पर मालिश मिल जाय तो कुछ रिकवरी हो जाय "आदि::आदि सत्ताईस साल के बेटे औेर २३ साल की बेटी की माँ आकेमी नीत्तो ने देवदूती की तरह इनाम्माजी का हाथ पकड़ लिया । रूम नम्बर ले लिया । यथासमय मेरे अंगमर्द को मिटा देने के लिये देवदूती आ पहुँची ।
इस शरीर पर अनेक तरह के मर्दन और तेलमालिश के अनुभव हुए हैं । भारत, यू.एस.ए., इण्डोनेशिया और जापान के विविध केन्द्रों के अलावा सिंगापुर, बेंकाक, फिन् लेंड, नोर्वे, स्वेडन, ऐस्टोनोया, ताइवान, चीन, लंदन, वियतनाम आदि अनेक देशों के अंगमर्द-प्रशमन नामक बाह्य उपचार का स्वयं के शरीर पर अनुभव कर लेने के बाद विद्यार्थियों को सिखाने के लिये हर जगह पर व्ययपूर्वक समय निकाला है ।
इस बार चेना हाँट स्प्रिंग (अलास्का) का अनुभव भले नहीं मिला परन्तु ईश्वर के द्वारा प्रेरित नीत्तो बहन ने जिस तरह अंगूठे एवं मुठ्ठी की मार से 90 मिनिट तक सारे शरीर को रगड़ रगड़ कर मेरे नाड़ीतन्त्र और मांसपेशयों में फँसे हुए एसिटाइल कोलाइन को निकाल कर मुझे तरोताज़ा कर दिया, मेरे नव-जीवन के लिये यह परमेश्वर-प्रसाद अविस्मरणीय रहेगा ॥
*****&&&&&&&&&*******
[1] :: शनिवार अमेरिका में ३१ जनवरी, जापान-भारत में ०१ फर्वरी २०१५ माउण्ट औरोरा स्काइलेण्ड, २३२०, फेयरबेंक्स क्रीक रोड़
[2] :: रविवार फर्वरी ०१, चान्दालर राँच ,५८०४ चेना हाँट स्प्रिंग रोड़ , पोष्टबाँक्स ७४८७७ फेयरबेन्क्स
[3]:: दो दिन-रात का चेना हाँट स्प्रिंग में निवास था । ओसाका से आने-जाने की दो रातें मिला कर कुल छै दिन और छै रात का प्रवास था ।
[4]::चरक संहिता इन्द्रिय स्थान स्वभाव विप्रतिपत्ति अध्याय के अनुसार
[i] :::Auroras are caused by charged particles, mainly electrons and protons, entering the atmosphere from above causing ionization and excitation of atmospheric constituents, and consequent optical emissions. Incident protons can also produce emissions as hydrogen atoms after gaining an electron from the atmosphere.
सूर्य की ज्वालामुखी से निकलती वायु के इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि पदार्थों का धरती के चुम्बकीय आकर्षण-मण्डल और धरती तथा सूर्य के मध्यवर्ती वातावरण में सोलर कोरोना से निकले वातातप से#######################
The immediate cause of the ionization and excitation of atmospheric constituents leading to auroral emissions was discovered in 1960, with a pioneering rocket flight made from Fort Churchill in Canada, to be a flux of electrons entering the atmosphere from above
oxygen emissions
green or orange-red, depending on the amount of energy absorbed.
Nitrogen emissions
blue or red; blue if the atom regains an electron after it has been ionized, red if returning to ground state from an excited state.
Interaction of the solar wind with Earth
The Earth is constantly immersed in the solar wind, a rarefied flow of hot plasma (a gas of free electrons and positive ions) emitted by the Sun in all directions, a result of the two-million-degree temperature of the Sun's outermost layer, the corona. The solar wind reaches Earth with a velocity typically around 400 km/s, a density of around 5 ions/cm3 and a magnetic field intensity of around 2–5 nT (nanoteslas; (for comparison, Earth's surface field is typically 30,000–50,000 nT).
रविवार, 15 नवंबर 2015
शिव-धनुष
शिव धनुष को गोस्वामी तुलसीदासजी ने राहू बताया । (राम चरित मानस, बालकाण्ड २४९ दोहे के बाद की पहली चौपाई )
जनक को यति नित्यचैतन्यजी ने पैदा करने वाला बताया । ( बृहद् आरण्यक उपनिषद् का अंग्रेजी में लिखा महाभाष्य )
प्रकृति को सभी विचारक माया बतलाते हैं, यह सर्व विदित है ।
पुरुष को यति नित्यचैतन्यजी ने हिरण्यगर्भ से कहा, जो (ब्रह्मा का एक पर्याय है ) । प्रकृति और पुरुष से संसार की सर्जना सर्व विदित है ॥
अब विचार आता है कि प्रकृति और पुरुष दोनों अव्यक्त हैं, दिखाई नहीं देते परन्तु इनकी सर्जना से संसार का रूप दिखला देने वाले दिव्यांशु और हिमांशु को दुनिया जानती है " सूर्य-चन्द्रमा " जिनके प्रभाव से पैदा हुए सभी प्राणी जीवित रह पाते हैं ॥
यावन् मात्र जीव के जनक को चिन्ता हुई" मेरी पैदाइश के विलायक तत्व शिवधनुष (दानवीभाव) राहू ने यदि सूर्य-चन्द्रमा को ग्रसित रक्खा तो मेरी पैदाइश का नाश हो जायगा" इसलिये प्रतिज्ञा ली कि " शिव-धनुष" राहू को तोड़ कर मेरी प्रजा की रक्षा करने वाले के साथ ही मेरी खेती में मिली बेटी "सीता" का विवाह करूँगा"। स्वयंवर रचा ॥
प्रकृति व्यक्त नही पर इसकी मूर्त रूप पृथ्वी है । इस धरती की बेटी का नाम सीता है , जिसे जनक के खेत में नारी के रूप में पाया गया । जनक ने समझ लिया , "मेरी बेटी के साथ विवाह करने के लिये सही पात्र वही हो सकता है , जो मेरी जनता के पालक सूर्य-चन्द्रमा को दानवी भाव राहू से ग्रसित " तमसो मा ज्योतिर्गमय " अँधेरे में से उजाले में ला सके और जीवित रख सके । इस लिये शिवधनुष (राहू) को तोड़ना जरूरी समझ कर प्रतिज्ञा ले ली ।
शिव धनुष को तोड़ने वाला जगत का पालक दैवीभाव ही हो सकता है कोई दानवीभाव नहीं ।
देवऋषि नारद के शाप से जगत के पालक को राम के रूप में अवतार लेना पड़ा । जिसने जनक की प्रतिज्ञा की रक्षा की और संसार के विलायकभाव शिवधनुष ( ज्योति को ढाँक कर तमस फैला देने वाले राहू ) को तोड डाला । परिणाम हुआःःधरती की बेटी सीता का धरती पर सूर्य-चन्द्र की ज्योति से प्रदर्शित जगत के रक्षक राम के साथ संयोग । शिव धनुष तोड़ना एक रूपक है ॥
दानवीभाव राहू का टूटना और जगत में
दैवीभाव का फैलना ही रामराज्य की स्थापना है ॥
%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%५
जगत के जनक, पालक और विलयक " ब्रह्मा विष्णु शिव " ये एक ही त्रिक-तत्व के तीन फलक (नाम) हैं । और इनकी मिलीजुली शक्ति से संसार की उत्पत्ति-स्थिति-विलय का वर्णन आदि कवि वाल्मीकि से लेकर अनेक लेखकों ने हमें बतलाया है ॥
संसार को महा अजय कहते हुए दुश्मन बतलाया (रा०च०मा०लंका काण्ड दोहा ८० क )।
संसार को अश्व और अश्वमेध से मानवमात्र में समाविष्ट दानवीभाव का विनाश करना ( बृहद् आरण्यक उपनिषद् का सार ऋषि याज्ञवल्क्य ने समझाया )॥
वेदों में बतलाये गये अश्वमेध याग का सार मालुम कर लेना आसान होगया ।
संसार रूपी शत्रु को जीतने के लिये अश्वमेध यज्ञ सदैव करते रहना बुद्धिजीवी का कर्त्तव्य होगया ।ःःःःःःःःःःः
सोमवार, 13 अक्टूबर 2014
वियतनाम (२०१४ सितम्बर में हमारे प्रवास के संस्मरण)
डा०
इनामुरा हिरोए शर्मा
और हरि शंकर शर्मा
प्रथम
पटल
भौगोलिक
स्थति:-
वर्तमान
में उत्तर से दक्षिण के बीच
कटिप्रदेश के जैसे पतला परन्तु
एड़ी से चोटी तक अच्छा फैला
हुवा यह प्रदेश विशाल प्रशान्त
महासागर के द्वारा पूर्व से
पश्चिम के ब्राजिल,
अमेरिका,
कानाड़ा
को मिला रहा है । जो त्रिकूट
द्वीप के देश हैं ।भारत से वियतनाम जाने के बीच कोई बड़ा समुद्र नहीं म्यानमर, थाइलेण्ड, लाओस, काम्बोडिया होकर पहुँच जाते हैं ।
आर्यावर्त
=
भारत
से सम्बन्ध:-
काम्बोडिया का अंकोलवट चौदहवीं शताब्दि का आर्यावर्त के इतिहास का जीता-जागता उदाहरण है । यहाँ हमें रामायण और महाभारत के साथ साथ त्रिवर्ग ( पाताल लोक , भूलोक और स्वर्लोक) के अस्तित्व का ज्ञान तीन विशाल विभागों में विभाजित कर कीमती पत्थरों की दीवारों पर कोतर कोतर कर अलग अलग रंगों में भर कर चित्रित \ खचित किया हुआ देखने को मिला । इस सियामरीफ के मार्गों के प्रारम्भ में सड़क के दोनो तरफ शेषनाग के फणों की आकृति को तथा शेषनाग के शरीर के आकार से सम्पूर्ण मार्गों की दोनो ओर की बाउन्ड्री को बनाया गया है । मार्ग के अन्त और दूसरे मार्ग की सन्धि पर चारों तरफ शेषनाग के फणों का आकार भूमि के भार को शेषनाग के द्वारा वहन किया जाने का परिचायक है । सड़कों का इस प्रकार का निर्माण भारतीय संस्कृति में बतलाई गई कथाओं का प्रत्यक्ष परिचायक है ।
काम्बोडिया की राजधानी फ्लोम्फ्नेम के सरकारी प्रदर्शनागार में हमें गणपति की मूर्ति, राधा-कृष्ण की मूर्ति के अवशेष देखने को मिले । भारत से यात्रालु वर्ग उस जमाने में पैदल चल कर भी जा सकते थे, जलयान अथवा वायुयान की आवश्यकता नही थी ॥
आर्यावर्त की एक सीमा का निर्देश करने वाला यह वियतनाम स्थान पुरातन काल में बहुत पूजनीय यात्रास्थल रहा था । जम्बुद्वीप के भद्राश्व खण्ड का यह देवलोक था ।
" वियत्" शब्द विष्णुपद का बोध कराता है । आकाश के पर्याय वाची नामों मे विहायसी भी एक शब्द है । संस्कृत साहित्य के अमरकोश आदि किसी भी कोश में ये पर्यायवाची नाम पढ़े जा सकते हैं ।
प्रलयकाल में शेषनाग पर शयन करने वाले सकल लोक के पालक विष्णु भगवान् के पाँव विष्णुपद की पावन पूजायात्रा करने के मार्ग में सियाम रीफ से भारतीय संस्कृति का अवलोकन करते हुए यात्रीगण भारत से वियतनाम जाया करते होंगे । यह संभावना हमें ई०सन्० २०१४ सितम्बर के दूसरे सप्ताह मे किये गये प्रवास के समय सात साल पहले सियामरीफ अंकोलवट और काम्बोडिया की राजधानी फ्लोम्फ्नेम आदि के प्रवासीय संस्मरणों को लिपिबद्ध कर लेने के लिये प्रेरणास्पद बन गई ।
आर्यावर्त
की सीमा का बोध अनेक पुरातत्व
विभागों के भौगोलिक चित्रों
द्वारा कराया गया है । हमारे
ऐहोरे प्रवासकाल में ईश्वरीय
शक्ति के स्वान्त:स्फुरण
से ऐसा लगता है कि इस प्रशान्त
महासागर में प्रलयकाल के
शेषशायी भगवान् विष्णु के
पाँव वियतनाम और युनाइटेड
स्टेट्स आँफ अमेरिका तथा कनाडा
भगवान् विष्णु का भाल का
प्रदेश रहता होगा । पौराणिकी
कथाओं के आधार पर यह कल्पना
कोई अतिशयोक्ति नहीं
कही जा सकती ॥ समस्त ब्रह्माण्ड
की सर्जना का यह विचार श्रीमद्
भागवत् महापुराण के तीसरे
स्कन्ध के आठवें आदि अध्यायों
में मिलता है ॥
द्वितीय
पटल
वीरता
का प्रतीक :-वियतनाम के वीर सपूतों ने चाइना , फ्रांस , रशिया , अमेरिका जैसे देशों के सामने घुटने नहीं टिकाये । सभी देशों के साम्राज्य-विस्तार-वादी विचारों और संघर्षों का सामना करते हुए उत्तर में हानोई और दक्षिण में साइगोन भाग को टुकड़ों में बँटने नही दिया । ऐसे आदर्श महान् वीर होचिमिन्ह के राष्ट्रीय सुरक्षा सत्प्रयत्नों का परिणाम हुआ है -- वियतनाम की राजधानी का नामकरण साइगोन से परिवर्तन * हो चि मिन् *
BEN
DUOC UNDERGROUND TUNNEL COMPLEX
यह
२०० कि०मी० लम्बी अनेक तलों
वाली ;
रहने,
खाने-पीने,
परिसंवाद
करने तथा युद्ध की शिक्षा देने
के लिये विशेष
प्रावधानों वाली गुफा है ।
इसमें
आने वाले यात्रियों को वीडेओ
द्वारा अनेक चित्र दिखलाये
जाते हैं । जिसमें युद्ध
की तैयारी में लगे निचले दूसरे
तल से निकल कर वियतनामी सैनिक
अमेरिकी सैनिकों को मार डालते
थे । तीसरे तल में हथियार ,
गोला-बारूद
बनाये जाते रहे । यह सब बतलाये
जाने के एक प्रदर्शनस्थल "
कुचि
"
तक
जाकर हमने अभ्यास
किया । भूगर्भ
में सुरक्षित युद्धसज्जा के
विविध विभागों को यहाँ देखे
जा सकते हैं :-
तृतीय
पटल
भारतीय संस्कृति से साम्यता:-
वियतनामी
प्रजा आस्तिक है । भगवान् के
पुराने मन्दिर हैं ,
नये
भी बनवाये जाते हैं । वहाँ
जाकर पूजा सेवा भी की जाती है
; परन्तु
हानोई की विशाल नदी के किनारे
पर बने एक चाइनीज मन्दिर में
दोपहर के समय कोई पुजारी नहीं
था ।
यहाँ
ट्रान् कुओक् पगोड़ा में भारत
के प्रथम राष्ट्रपति डा०
राजेन्द्र प्रसाद जी के द्वारा
१९५९
समर्पित बोधि (पिप्पल
का पेड़)
वृक्ष
खूब अच्छी हालत में दिखाई
दिया,
जिस
पर उनका लेख भी देखने को मिला
।
एक
विशाल मन्दिर वियतनाम की
आज़ादी की बीसवीं सालगिरह पर
१९९५ ई० में बनाया गया । यह
मन्दिर ७०,०००
वर्ग मीटर के विस्तार में
बनाया गया । अपने देशभक्त
बलिदानियों की यादगार के लिये
देशवासियों की खुशियाँ मनाने
मे लिये इसका नाम “BEN
DUOC MARTYR'S MEMORABLE TEMPLE” रखा
है ।शरदपूर्णिमा की रजनी सुरभि के साथ साथ चारु चन्द्र की चंचल किरणों में नाचते गाते नन्हे नन्हे बालकों के साथ चलचित्र में हमें सहभागी बन जाने का आनन्द मिला । सौभाग्य से २०१४ सितम्बर ०८ की रात कहो
दिनांक
०९ की शुरुआत डाँ० इनामुरा
हिरोए शर्मा के जन्मसमय का
मज़ा लूटने का यही सुअवसर रहा
। हानोई के होटल हिल्टन प्लाजा
का यह आनन्द हमारे जीवन में
अविस्मरणीय बन गया ।
राजस्थान
के उदयपुर का कठपुतली नाच
ईश्वर की अंगुलियों पर मानव
की विविध गतिविधि को दिखलाई
देने वाली भारत में केवल जमीन
पर ही देखी थी । हानोई के THANG
LONG WATER PUPPETS THEATRE में
तो यह जलक्रीड़ा देखते देखते
हम हँसी से लोट-पोट
होगये । परमात्मा के विविध
रूपों का यह खेल याद रहेगा ।स्वरों के उच्चारण में संस्कृत भाषा का बोध :-
हमारे प्रवास में मेकोन् रिवर से लौटते समय वियतनामी उच्चारण में एक विशेषता का ज्ञान मिला । एक ही अक्षर उच्चारण-भेद से ६ अर्थ दे देता है । जैसे मा = ma इसके लिये उस अक्षर के ऊपर या नीचे अथवा एक ही स्वर पर एक से अधिक निशान लगाने होते हैं ॥
जापानी काँजी लिपि में एक अक्षर का उच्चारण वैसा ही होता है परन्तु उसके लेखन की विशेषता से अनेक विविध अर्थ हो जाते हैं :- का \ या \ तो इत्यादि इसके उदाहरण हैं ।
पितृतर्पण :-
अपने पूर्वजों की यादगार में उनके नाम, फोटो, विशेषताओं को लिखा जा कर पास पास में पति-पत्नी के ऐसे स्मारक बनाये गये हैं , जहाँ पर बैठ कर दस-बारह परिजन उन उन पूर्वजों की गाथाओं को अपनी अगली पीढी को बतला सकें ॥
हानोई के समुद्र में वर्ल्ड हेरिटेज " हा लोंग बे " का तीन घण्टों का प्रवास भी हमारे जीवन में अविस्मरणीय है ॥ विभिन्न प्रदर्शनागारों में भारतीयता दिखाई दी ।
नगर की रचना :-
हानोई के बाजारों में चलने वाले लोगों की सुरक्षा के लिये सड़क के किनारों पर दोनों तरफ ६-७ फीट की ऊँचाई वाली दीवारों पर चाइना मिट्टी के रंग-बिरंगे टुकड़ों से अपने देश की विशेषताओं का प्रदर्शन भी एक सुविकसित देश की विशेषता बतलाता है । ऊँचे से ऊँ ७२ मंजिल का भी एक मकान है ।
होचिमिन्ह नगर में 1975 September 04 के दिन WAR REMNANTS MUSEUM का उद्घाटन विश्व-शान्ति के लिये किया गया है । यहाँ की तीसरी मंजिल में अधोलिखित लेख न केवल पठनीय है अपितु अपने देश के लिये अनुकरणीय भी है :-
“ Vietnam has the right to enjoy freedom and independence and has really become a free and independent country. The entire Vietnamese people are determined to mobilize all their physical and mental strength to sacrifice their lives and property in order to safeguard their liberty and independence ” ( September 02nd 1945 ).
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