रविवार, 23 अप्रैल 2017

मेरी एञ्जियोग्राफी
सामान्य जीवन के गतिमान् व्यवहार में विगत कुछ वर्षों से साथ में चलती आ रही कमजोरी तथा जामनगर के घर को छोड़ कर निकलने के बाद के विशेष संघर्षमय जीवन में लिखी जा रही " निर्वाण षट्क " नामिका दैनन्दिनी में दि०२९ जनवरी एवं ११ और २४ फर्वरी आदि की जैसी परिस्थितियों ने मिल कर आक्रमण कर दिया । तेवीस साल पहले सन् १९९४ फर्वरी की दुर्घटना से टूटी ११ हड्डियों के कारणःःउठने-बैठने-चलने-फिरने में तो अशक्ति थी ही; ग्यारह साल पहले सन् २०१६ मे प्रोस्टेट के ओप्रेशन के बाद रात्रि में चार-पाँच बार मूत्रोत्सर्ग से निद्राभंग तो होता ही था, शरीर को हिलाने-डुलाने में 'हूँ' हुँ' उच्चारण " उद्गीथ " तन के मन से संघर्ष पर मेरा सदा विजयःःदिला ही रहा है ःःःअब उस सब के साथ-साथ \क दिन तमोदर्शन ( आँखों के सामने अँधेरा सा छा जाना, खड़े होने पर सर का चकराना, इधर-उधर-आगे भी कदम नहीं रख पाना,दिल के धूजने जैसा लगना, वक्षस्थल का भारीपन, मन और तन का संघर्ष, बल का क्षीण होना आदि लक्षणों ने होस्पीटल जाने का सोच लिया गया ।" मार्च मास का अन्त होते होते इस जीवन का अन्त भी नजदीक आगया लगता है "ऐसा लगने पर MARCH३१ तारीख की शाम मेरे रक्त-चाप को मापा गया । डाँ० इनामुरा हिरोए शर्मा कुछ घबराई । होस्पीटल जुसो शिमिन् ब्योइन् लेजाना-लेआना, चौबीसों घण्टे सावधानी के साथ रहन-सहन- भोजन आदि में सेवामें जुट गई. मैं तो इस हालत को शीघ्र हृदयाकाश से चित्ताकाश की विलीनता का दि०८ दिसेम्बर २०१६ वाले दिन के इस निर्वाण षट्क वाले आयोजन की सफलता मानता हूँ ...सही समय....सही मार्गदर्शन...और मन को दी गई प्रेरणा को एक निमित्तमात्र मान रहा हूँ । उच्चावच मेरा रक्त-चाप १००\४० में ही रहा करता था । मन के साथ तन के संघर्ष ने इसे द्विगुणित जैसा कर दिया है । जीवन-संगिनी भी इस जीवन को इताना जल्दी मार्चपास नहीं होने देना चाहती है । बसःःःसेवा में जुट गई है ।
एप्रिल एक और दो शनि-रवि होने से ०३ तारीख को प्रोस्ट्रेट के विचार से मूत्रवह स्रोतस् वाले डाक्टर से मिले । मूत्र में विकार पाया गया । एन्टीबायोटिक सात दिन तक लिया । दि०४ को हृदय-परीक्षण वाले डाक्टर का निर्धारण हुआ । सात दिन तक ई०सी०जी० मापने को मिला यन्त्र घर लाये । घबराहट जैसी हालत में हृदय पर लगा कर उस मशिन से स्वयं रेकोर्डिंग करता रहा । ता०११ को होस्पीटल में उस मशीन के ग्राफ ने बतलाया कि मेरे देह में ऐसा कोई विकार नहीं है । ता० ११ को सी०टी० स्केन किया, ता०१३ एको परीक्षण हुआ ता०१८ को C T = Computed tomography स्केन से पता लगाया गये निदान को हमें बतलाया गया कि "हृदय के मांसपिण्ड (मायोकार्डियम) को प्राणवायु-प्रभूत-रक्त से पोषित करने वाली मुख्य 'कोरोनारी आर्ट्रीज'ः दाहिनी धमनी में ७५% और बाँई धमनी में ५०% चूना जमा हो गया है । एञ्जियोग्राफी करनी चाहिये । मैनें इस पर मेरे परिवार के विचार माँग लिये । फेस-बुक द्वारा अनेक विचार मिल गये ॥
क्या है एञ्जियोग्राफी-
ओक्सीजन-प्रभूत रक्त वाहिका धमनीः- The arteries are the blood vessels that deliver oxygen-rich blood from the heart to the tissues of the body. Each artery is a muscular tube lined by-
- smooth tissue and has three layers:
A: The intima, the inner layer lined by a smooth tissue called endothelium; B: The media, a layer of muscle that lets arteries handle the high pressures from the heart; C: The adventitia, connective tissue anchoring arteries to nearby tissues.


स्वाध्याय का सारांशः- 'एञ्जियोग्राफी' एक निदान की पद्धति है साथ साथ मध्यवर्त्ती चिकित्सा भी थोड़ी हो जाती है । इसमें ओक्सीजन-प्रभूत रक्त वाहिका धमनी की शल्यक्रिया के द्वारा एक मजबूत नलिका ( केथेटर )को हृत्पिण्ड के मायोकार्डियम नामक मांस को सुपोषित रखने वाली ' कोरोनरी आर्ट्री ' नामिका बाईं और दाहिनी धमनियों तक पहुँचा कर विशिष्ट-रंजक-पदार्थ को सूचीवेध के द्वारा तत्तत् स्रोतोरोधक स्थानों पर पहुँचाकर Fluoroscopy फ्लुओरोस्कोपि फोटोग्राफी से विविध चित्र लिये जाकर उनके अन्तर्वर्त्ती कोषाणुओं (एण्डोथेलियल सेल्स) पर जमगये चूने(केल्शियम) को कुचर कर हटाया जाता \ जासकता है ; अथवा उस स्रोतोरोध की दशा का परीक्षण मात्र किया जाता है ।
चूना ( केल्शियम )- संसार में, यह हर किसी रचना का एक संघटक तत्व है । रक्तवाहिनियाँ सदैव रक्त में मध्यम-प्रमाण में रहने वाले केल्शियम ( चूने ) को संपूर्ण देह में संवहन करतीं ही रहतीं हैं । चूने की प्रभूत मात्रा अस्थियों में, मध्यम मात्रा रक्त में और अल्प मात्रा कोषाणुओं में होती ही है । "सम से सम का वर्धन होता है" यह आयुर्वेद का सर्वमान्य पहला सिद्धान्त है । रक्त के साथ परिवाहित मध्यम मात्रा वाला चूना रक्त वाहिकाओं की अन्तर्वर्त्ती कोषाणुओं (एण्डोथेलियल सेल्स) में भी अल्प मात्रा में होता ही है । यह किसी भी प्रकार के "-वैगुण्य" होने से उस जगह देह में हर कहीं 'समःसमम् अनुधावति आन्तर्यतः'(साँ०दर्शन, वाचस्पति मिश्र) जमा हो जाता है । अत एव यदि एञ्जियोग्राफी करा भी लीःः१ः निदान हो गया \ २ चूना कुचर भी दिया गया तो फि नया चूना जमने लगेगा । क्योंकि यह तो एक स्वाभाविक जीवन-प्रक्रिया है । साठ वर्ष की वय के बाद मानव-मात्र के देह में चालू हो जाती है । संसार के समस्त मानव में पाई गई है । चूना (केल्शयम), स्नेह(कोलेस्ट्रोल), नियम-बद्ध-मृत-कोषिकायें (सेल्स), नियम-विरुद्ध-मृत-कोषिकायें (सेल्स) आदि मानव तन में जिस-किसी अंग-प्रत्यंग के स्रोतस् में गति-हीन होकर अवरुद्ध हो जाते हैं; वहीं पर स्रोतोरोध होने से अलग नामकी व्याधियाँ उत्पन्न हो जातीं हैं ।
"एञ्जियोग्राफी नहीं कराना है" परिवार के विचारों के (पार्लियामेण्ट्रीःबहुमत में) और इतने दिनों के मेरे और डाँ०इनामुरा हिरोए शर्मा के स्वाध्याय ने यह निर्णय; आज दि०२२ एप्रिल '१७ की प्रभात में करवा लिया है ।
चिकित्साः किसी में ज्यादा तो किसी में कम । यदि ९०% से ज्यादा चूने का भराव जिस किसी भी अवयव में हो जाय तो शल्य-चिकित्सा कराई जाती है । क्योंकि गतिविधि में अवरोध होने लगता है और अनेक प्रकार की तकलीफें मानव को भुगतनी पड़ती हैं,
मेरी वय और कार्यशक्ति के साथ दैनिक जीवन-चर्या को समझने वाले विविध डाक्टरों के परामर्श के बाद तथा हम दौनों के स्वाध्याय के बाद यह निर्णय लिया गया है "एञ्जियोग्राफी नहीं कराना है" क्योंकि संयमित जीवन चर्या, योगासन आदि जो आयुर्वेदीय उपचार हैं, इनके सिवाय इसकी कोई चिकित्सा नहीं है । आधुनिक चिकित्सा में रक्त के घनत्व को तरलता देने वाली एस्पेरिन् , be on aspirin वाली दवाइयाँ बिमारी को दबा दिये रखतीं हैं, आजनम उनका सेवन करना पड़ता है और अनेक नये दूसरे विकारों को आमन्त्रित भी कर लिया जाता है । । फिर भी यदि साथ आयुर्वेदीयपद्धति का सहरा नहीं लिया जाय ःः मरण तो अवश्यंभावी है । रक्त के घनत्व को तरलता देते रहने से " देहं 'रक्त' इति स्थितिः"देह के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग और संपूर्ण कोषिकाओं पोषित करते रहना और सबल बनाये रखना रक्त पर ही निर्धारित है । आधुनिक दवाइयों से रक्त को तरलित करवा देना ठीक नहीं । साथ ही एञ्जियोग्राफी नहीं कराना ही उचित है

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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

हवन, होम और आहुति

हवन-होम और आहुति                                                                                                                      
 हिन्दू-संस्कारों में हवन एक  
                                                                                                                                          महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है । उपनयन, गृह-निर्माण

नूतन गृह-प्रवेश, विवाह आदि आदि शुभ कार्यों में कुछ अाहुति


नवीनता का प्रवेश एक जीवन में होता है । इसके लिये किसी भी


 नये परिवेश के पदार्पण के पहले अपने गृह में शान्ति बनाये 


रखने के लिये ग्रह-शान्ति की जाती है । जिससे घर में सुख 


और शान्ति बनी रहे । भूमण्डल पर दिव्यांशु (सूर्य), हिमांशु 


(चन्द्र) आदि आकाशीय ग्रहों से गर्मी-सर्दी, ऊँच-नीच जैसे 


प्रभाव स्वाभाविक तौर पर पडते ही रहते हैं । इस भूमि पर रहने


 वालों के घरों में गरम-ठण्डे, अच्छे-बुरे जैसे वातावरण में


 समता बनाई रखी जा सके । इस उद्देश्य से ग्रह-शान्ति कराई 


जाती है । यह एक हवनप्रक्रिया है , जिसका मानव जीवन में 


बहुत बड़ा महत्व है । यज्ञ के नाम से वेद-काल से यह परम्परा


 चली आ रही है । ग्रह-शान्ति की पूर्णता के लिये घृत-धारा-


होम किया जाता है । पूर्णाहुति का यह अविभाज्य अंग है । 


नभोमण्डल और भूमण्डल के बीच में हरदम यज्ञ होता रहता है ।


 इससे प्राण का संचार सही ढंग से होता रहता है । आकाश से 


ओझोन गेस और धरती से कार्बन डाइओक्साइड गेस की 


गतिविधि से ओक्सीजन (प्राणवायु) की परिस्थिति से आज का 


मानव परिचित है । यह भी एक प्रकार का यज्ञ ही है, जो 


हरदम होता ही रहता है । वेद-विज्ञान का प्रारम्भ अग्नि के 


ज्ञान से हुआ । ऋग्वेद का पहला मन्त्र "अग्निम् ईले पुरोहितम् 


, यज्ञस्य देवम् .....” यज्ञदेव का भोजन सब से पहले 


हितकारी तत्व" अग्नि " में घृत-धारा-होम है । यह एक   


वैज्ञानिक विचार धारा है । ग्रह-शान्ति की पूर्णता के समय 


अग्नि में दी जाने वाली आहुति के लिये ऋत्विजों के द्वारा 


वेदमन्त्रों का उद्गीथ किया जाता है । इस समय बोले जाने वाले


 मन्त्रों में से एक मन्त्र पर यहाँ वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत  हैः मन्त्रःःः


   चित्तिं जुहोमि मनसा घृतेन ..विश्वकर्मणे....दाभ्यं 


हविः(यजुर्वेद १७-७८) से शुरू करके" सप्त ते अग्ने समिधः


सप्तजिव्हाः; सप्त ऋषयः; सप्त धाम प्रियाणि । सप्त होत्राः;


सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा (यजुर्वेद 


१७-७९) इत्यादि...१० मन्त्र। हमें इसके प्रत्येक शब्द को 


समझना है ः- “ मनसा चित्तिं जुहोमि..हविः" मैं मेरे मन से 


घृतेन घी के द्वारा चित्ति = Thinking, wisdom, 


intention, celebrity का विश्वकर्मणे समस्त सांसारिक 


कार्यों के लिये हवन करता हूँ । घर-संसार में सुख और शान्ति 


बनाये रखने का उद्देश्य है ।                                                                     


 अग्नि क्या है ? हवन जिन पदार्थों


 घी आदि से किया जाता है वो समिधायें हैं । ये समिधा क्या है 


?? इस प्रक्रिया का आविष्कार किसने किया ??? कितने तरीकों


 से ये हवन किया जाता है ???? इसका परिणाम क्या होता है 


???? विश्व में हर पल हर घढ़ी होते रहने वाले विनाशकारी 


भावों का विनाश करने के लिये हवन (यज्ञ) किया जाता है । 


यज्ञदेव का दूत “अग्नि ” है; "अग्निं दूतं पुरो दधे(यजु०२२-१७) । 


() "तेऽअग्ने सप्त जिव्हाः" इस अग्नि की 


सात रसनायें हैं ः- १ः जब हवन किया जाता है तब अग्नि में 


से काली काली धूवाँ निकलती है, यह पहली जीभ है ; यही धूम्र 


जब और अधिक घन हो जाती है , वह कराली नाम की दूसरी 


जीभ है । हवन पदार्थ का विलयन होने पर मनो वेग के जैसे 


अग्नि को दूर-दूर से देखा जा सकता है, इसलिये तीसरा नाम 


मनोजवा हुआ । संसार का कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं जिसे अग्नि


 की लपट \रसना चाट नहीं सके, इससे इसका चौथा नाम 


विश्वरुचि है । स्फुलिंगिनी इसका पाँचवां नाम, जिसकी 


चिनगारियाँ हम सब देखते ही हैं । छठा नाम है धूम्रवर्णा, 


जिसके आधार पर एक न्याय बना “यत्र यत्र धूमः तत्र तत्र 


वन्हिः” जिसे साहचर्य भाव से धूँवे का अग्नि के साथ रहने के 


कारण इसे 'व्याप्ति' की संज्ञा दी गई, राख का रंग । 


नीललोहिता इसकी सातवीं रसना है । जला देना और उजाला 


कर देना अग्नि के कार्य हैं । प्रकाश के सात रंगों के मिश्रण में 


अग्नि का यह वर्ण लाल और पीले रंग के मिलादेने से बन जाता


 है, जो सुप्रसिद्ध है ॥                                                                   


   हवन की आवहनीय अग्नि में जिन 
समिधाओं से होम किया जाता है

उनमें घी प्रधान है । गाय का घी और यव का पाण्डु रंग,

तिल का काला, पक्वान्न चावल का  सफेद, कमल बीज का धूम्र

सरसों का पीला, नौ ग्रहों की सूर्य के लिये आकडा, चन्द्र हेतु पलाश (ढाक), 

मंगल को खैर, बुध को अपामार्ग(आँधीझाडा), गुरु हेतु पिप्पल

शुक्र के लिये उदुम्बर (गूलर), शनि के लिये शमी, राहु हेतु दूब और केतु के 

लिये कुश; इनमें समस्त रंगों का समावेश हो जाता है । मानव 


का स्वभाव भी विविध रंगी होता है । भोजन के समय वैश्वानर


नामक अग्नि का आवाहन किया जाता है । 'अहं वैश्वानरो भूत्वा


 प्राणिनां देहम् आश्रितः' श्रीमद् भगवद् गीता १५-१४ जिससे 


आहार का परिणमन सही ढंग से होकर मनुष्य के देह में रस-


रक्त आदि शुक्र तक के सातों धातुओं का पोषण होता है । () "


सप्त ते अग्ने समिधः" ठीक इसी तरह वेद 


कालीन यज्ञ परम्परा की सात समिधाएँ हैं जिनको होम देना है 


उपर्युक्त अग्नि में । विश्व मंगल कामना से, अपने घर की 


सुख-समृद्धि की कामना से, समाज में सद्भाव बनाये रखने के 


लिये हमें आहुति देनी है ; सप्त समिधः इन सात समिधाओं                                                                      की 


*अहंकार ** मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के लोलुपभावी विषयों 


की ताकि इनका मिथ्या योग नहीं हो । इससे पहला लाभ होता


है अपना उत्तम स्वास्थ्यलाभ, दूसरा घर का सुख, तीसरा 


संसार में आपसी सहयोग और चौथा भूमण्डल से नभोमण्डल के 


वातावरण की शुद्धि ः घृतधारा की आहुति को इसलिये प्रधान 


बतलाया है कि यह गायमाता के खाद्य पदार्थों से गार्ह्यपत्य 


अग्नि के द्वारा परिणमन होने में जो जो प्रक्रियायें होतीं हैं ,


मानव जीवन में वे सभी भोजन के रूपान्तर से पाईं जातीं हैं ।


रस धातु से ओजस् और अहंकार तक । गीता हमें बतलाती है


 ःविषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः(-५९) सही आहुति


 यही है जो इस प्रक्रिया के आविष्कारक सप्त ऋषयः सात 


ऋषियों ने (अंगिरस् , अत्रि, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि और 


वशिष्ठ ) एक साथ अग्नि देवता के सामने, आर्षीजगती छन्द 


में, निषाद स्वर के साथ प्रस्तुत की सप्तधाम प्रियाणि इनके 


प्यारे सात धाम ःभूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक


जनोलोक, तपोलोक औेर सत्य लोक रहे । हवन की आहुतियों 


से क्रमशः इन धामों का प्रवास होता रहता है । इस हवन को 


करने वाले सात होतृगण हैं , जिनमें यजमान के साथ अध्वर्यु


उद्गाता, आचार्य और तीन ऋत्विजों का समावेश होता है ।


सप्तधा यजन्ति सात प्रकार सेःः शब्द, स्पर्श, तेजस् , रस


गन्ध, भाव और प्रभाव के द्वारा सप्तयोनीः सात योनियाँ


मनुष्य, पशु, पक्षी, जलचर, कृमि, कीट, पतंग नामक योनियों 


का पोषण कर आपृणस्व घृतेन समाज में सामरस्यता 


harmony (Apollonian and Dionysian) दैवीभाव की 


स्थापना होती है स्वाहा को अग्निदेव की सहधर्मिणी बतलाया


गया है ।                                                                    


  हवन, होम और आहुति हर घर में हर दिन हर समय 


करते रहने से गृह शान्ति और आकाशीय तत्व ग्रहों की शान्ति


के लिये घृतधारा आहुति । 


ये वेदकाल से चली आ रही परम्परा समाज में दैवी भावों को 


बढा कर सामरस्यता की प्राप्ति के लिये पूर्णाहुति का बोध 


कराती है ।